श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 21: कौरव-पाण्डव-दलोंका भयंकर घमासान युद्ध  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  8.21.40 
रूपाण्यत्यर्थकान्तानि द्विरदाश्वनृणां नृप।
समुन्नानीव वस्त्राणि ययुर्दुर्दर्शतां पराम्॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! हाथी, घोड़े और मनुष्यों के अत्यंत सुन्दर मुख भी कीचड़ से सने वस्त्रों के समान कुरूप हो गए थे। उनकी ओर देखना कठिन हो रहा था।
 
O Lord of men! The extremely beautiful faces of elephants, horses and men had also become as ugly as clothes soaked in mud. It was becoming difficult to look at them. 40.
 
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलयुद्धे एकविंशोऽध्याय:॥ २१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुलयुद्धविषयक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २१॥

 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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