श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 18: अर्जुनके द्वारा हाथियोंसहित दण्डधार और दण्ड आदिका वध तथा उनकी सेनाका पलायन  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  8.18.14 
स पार्थबाणैस्तपनीयभूषणै:
समाचित: काञ्चनवर्मभृद् द्विप:।
तथा चकाशे निशि पर्वतो यथा
दावाग्निना प्रज्वलितौषधिद्रुम:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
अर्जुन के सुवर्णमय बाणों ने उसके सम्पूर्ण शरीर को छेद दिया था। इस कारण सुवर्णमय कवचधारी वह हाथी उसी प्रकार शोभायमान होने लगा, जैसे जलती हुई औषधियों और वृक्षों से आच्छादित पर्वत रात्रि में लकड़ी के जलाने से प्रकाशित हो जाता है।
 
Arjuna's golden arrows had pierced his entire body. Due to this, the elephant wearing golden armor started looking beautiful in the same way as a mountain covered with burning medicines and trees gets illuminated from a firewood at night. 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)