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श्लोक 8.13.26  |
स शरै: क्षतसर्वाङ्ग: सात्यकि: सत्यविक्रम:।
रराज समरे राजन् सपुष्प इव किंशुक:॥ २६॥ |
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| अनुवाद |
| राजन! उन बाणों से युद्ध करते समय महाबली सात्यकि के समस्त अंग क्षत-विक्षत होकर रक्त से लथपथ हो गये और वे खिले हुए पलाश के समान शोभायमान हो गये। |
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| Rajan! In the battle with those arrows, all the organs of the mighty Satyaki got mutilated and bled and he became beautiful like a blooming palasha. |
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