श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 10: कर्णको सेनापति बनानेके लिये अश्वत्थामाका प्रस्ताव और सेनापतिके पदपर उसका अभिषेक  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  8.10.37 
यथा ह्यभ्युदित: सूर्य: प्रतपन् स्वेन तेजसा।
व्यपोहति तमस्तीव्रं तथा शत्रून् प्रतापय॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
जैसे उदित होता हुआ सूर्य अपने तेज से अंधकार को नष्ट कर देता है, उसी प्रकार तुम भी अपने शत्रुओं को पीड़ा देकर उनका नाश करो॥ 37॥
 
Just as the rising Sun destroys the darkness by its brilliance, in the same way you too should torment and destroy your enemies.'॥ 37॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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