श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 10: कर्णको सेनापति बनानेके लिये अश्वत्थामाका प्रस्ताव और सेनापतिके पदपर उसका अभिषेक  »  श्लोक 34-35
 
 
श्लोक  8.10.34-35 
जहि शत्रुगणान् सर्वान् महेन्द्रो दानवानिव।
अवस्थितं रणे दृष्ट्वा पाण्डवास्त्वां महारथा:॥ ३४॥
द्रविष्यन्ति च पञ्चाला विष्णुं दृष्ट्वेव दानवा:।
तस्मात् त्वं पुरुषव्याघ्र प्रकर्षैतां महाचमूम्॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
जैसे देवराज इन्द्र ने दैत्यों का संहार किया, वैसे ही आप भी समस्त शत्रुओं का संहार करें। जैसे भगवान विष्णु को देखकर दैत्य भाग जाते हैं, वैसे ही पाण्डव और पांचाल योद्धा आपको युद्धभूमि में सेनापति के रूप में उपस्थित देखकर भाग जाएँगे; अतः हे नरसिंह! आप इस विशाल सेना का नेतृत्व करें॥ 34-35॥
 
‘Just as Devraja Indra killed the demons, you too kill all the enemies. Just as the demons run away on seeing Lord Vishnu, similarly the Pandava and Panchala warriors will run away on seeing you present as the commander in the battlefield; therefore, O lion of men! You lead this huge army.॥ 34-35॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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