श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 94: दुर्योधनका उपालम्भ सुनकर द्रोणाचार्यका उसके शरीरमें दिव्य कवच बाँधकर उसीको अर्जुनके साथ युद्धके लिये भेजना  »  श्लोक 68
 
 
श्लोक  7.94.68 
आग्निवेश्यो मम प्रादात् तेन बध्नामि वर्म ते।
तवाद्य देहरक्षार्थं मन्त्रेण नृपसत्तम॥ ६८॥
 
 
अनुवाद
अग्निवेश्य ने मुझे यही सिखाया था । श्रेष्ठ ! उसी मंत्र से आज मैं तुम्हारे शरीर की रक्षा के लिए यह कवच बाँध रहा हूँ । 68॥
 
Agnivesya had taught me that. The best! With the same mantra today I am tying this armor to protect your body. 68॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)