श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 94: दुर्योधनका उपालम्भ सुनकर द्रोणाचार्यका उसके शरीरमें दिव्य कवच बाँधकर उसीको अर्जुनके साथ युद्धके लिये भेजना  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  7.94.64 
द्रोण उवाच
इत्युक्त्वा वरद: प्रादाद् वर्म तन्मन्त्रमेव च।
स तेन वर्मणा गुप्त: प्रायाद् वृत्रचमूं प्रति॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
द्रोणाचार्य कहते हैं- राजन ! ऐसा कहकर वरदाता भगवान शंकर ने उन्हें वह कवच और उसका मन्त्र दे दिया। उस कवच से सुरक्षित होकर इन्द्र वृत्रासुर की सेना का सामना करने के लिए चले गए ॥64॥
 
Dronacharya says- King! Saying this, Lord Shankar, the giver of blessings, gave him that armor and its mantra. Protected by that armor, Indra went to face Vritrasur's army. 64॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)