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श्लोक 7.91.5  |
अश्वत्थामा यथा तात रक्षणीयस्त्वयानघ।
तथाहमपि ते रक्ष्य: सदैव द्विजसत्तम॥ ५॥ |
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| अनुवाद |
| ‘तात! निष्पाप द्विजश्रेष्ठ! जैसे अश्वत्थामा आपके द्वारा रक्षित है, वैसे ही मैं भी सदैव आपकी रक्षा का पात्र हूँ। 5॥ |
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| ‘Tat! Sinless Dwijshreshtha! Just as Ashwatthama is protected by you, similarly I too always deserve protection from you. 5॥ |
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