श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 91: अर्जुन और द्रोणाचार्यका वार्तालाप तथा युद्ध एवं द्रोणाचार्यको छोड़कर आगे बढ़े हुए अर्जुनका कौरव-सैनिकोंद्वारा प्रतिरोध  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  7.91.5 
अश्वत्थामा यथा तात रक्षणीयस्त्वयानघ।
तथाहमपि ते रक्ष्य: सदैव द्विजसत्तम॥ ५॥
 
 
अनुवाद
‘तात! निष्पाप द्विजश्रेष्ठ! जैसे अश्वत्थामा आपके द्वारा रक्षित है, वैसे ही मैं भी सदैव आपकी रक्षा का पात्र हूँ। 5॥
 
‘Tat! Sinless Dwijshreshtha! Just as Ashwatthama is protected by you, similarly I too always deserve protection from you. 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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