श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 91: अर्जुन और द्रोणाचार्यका वार्तालाप तथा युद्ध एवं द्रोणाचार्यको छोड़कर आगे बढ़े हुए अर्जुनका कौरव-सैनिकोंद्वारा प्रतिरोध  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  7.91.33 
ततोऽब्रवीत् स्वयं द्रोण: क्वेदं पाण्डव गम्यते।
ननु नाम रणे शत्रुमजित्वा न निवर्तसे॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
यह देखकर द्रोणाचार्य ने स्वयं कहा - 'हे पाण्डुपुत्र! तुम इस प्रकार कहाँ जा रहे हो? तुम तो युद्धभूमि से शत्रु को पराजित किये बिना कभी नहीं लौटे।'
 
Seeing this, Dronacharya himself said - 'O son of Pandu! Where are you going like this? You never returned from the battlefield without defeating the enemy.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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