श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 91: अर्जुन और द्रोणाचार्यका वार्तालाप तथा युद्ध एवं द्रोणाचार्यको छोड़कर आगे बढ़े हुए अर्जुनका कौरव-सैनिकोंद्वारा प्रतिरोध  »  श्लोक 31-32
 
 
श्लोक  7.91.31-32 
पार्थश्चाप्यब्रवीत् कृष्णं यथेष्टमिति केशवम्॥ ३१॥
तत: प्रदक्षिणं कृत्वा द्रोणं प्रायान्महाभुजम्।
परिवृत्तश्च बीभत्सुरगच्छद् विसृजन् शरान्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
तब अर्जुन ने भी सच्चिदानन्दस्वरूप केशव से कहा - ‘प्रभो! आपकी जैसी इच्छा हो वैसा ही कीजिए।’ तत्पश्चात अर्जुन महाबाहु द्रोणाचार्य की परिक्रमा करके लौट आए और बाणों की वर्षा करते हुए आगे बढ़ गए ॥31-32॥
 
Then Arjun also said to Keshava in the form of Sachchidananda - 'Lord! Do as per your wish.' After that, Arjun returned after circling the mighty-armed Dronacharya and went ahead showering arrows. 31-32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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