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श्लोक 7.9.44  |
मुह्यते मे मनस्तात कथा तावन्निवार्यताम्।
भूयस्तु लब्धसंज्ञस्त्वां परिपृच्छामि संजय॥ ४४॥ |
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| अनुवाद |
| पिता जी! इस समय मेरा मन मोहित हो रहा है, अतः आप यह कथा बंद कर दें! संजय! जब मैं होश में आऊँगा, तब आपसे यह समाचार पूछूँगा। 44। |
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| Father! At this moment my mind is getting fascinated; therefore you should stop this story! Sanjay! When I regain consciousness I shall ask you this news. 44. |
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इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणाभिषेकपर्वणि धृतराष्ट्रशोके नवमोऽध्याय:॥ ९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणाभिषेकपर्वमें धृतराष्ट्रका शोकविषयक नवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९॥
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