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mahabharat 7.9.10-11h: मैं भाग्य को ही सर्वश्रेष्ठ मानता हूँ। प्रयत्न ही विपत्ति का कारण है। सचमुच, मेरा यह हृदय लोहे का बना है, जो द्रोणाचार्य के मारे जाने की बात सुनकर भी सौ टुकड़ों में नहीं टूटता। 10 1/2   |   mahabharat अध्याय 7.9: द्रोणाचार्यकी मृत्युका समाचार सुनकर धृतराष्ट्रका शोक करना   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 9: द्रोणाचार्यकी मृत्युका समाचार सुनकर धृतराष्ट्रका शोक करना  »  श्लोक 10-11h
 
 
श्लोक  7.9.10-11h 
दैवमेव परं मन्ये नन्वनर्थं हि पौरुषम्।
अश्मसारमयं नूनं हृदयं सुदृढं मम॥ १०॥
यच्छ्रुत्वा निहतं द्रोणं शतधा न विदीर्यते।
 
 
अनुवाद
मैं भाग्य को ही सर्वश्रेष्ठ मानता हूँ। प्रयत्न ही विपत्ति का कारण है। सचमुच, मेरा यह हृदय लोहे का बना है, जो द्रोणाचार्य के मारे जाने की बात सुनकर भी सौ टुकड़ों में नहीं टूटता। 10 1/2
 
I consider destiny to be the best. Efforts are the cause of disaster. Indeed, this heart of mine is made of iron, which does not break into hundred pieces even after hearing that Dronacharya has been killed. 10 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)