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mahabharat 7.85.31: धर्म की आशा रखने वाला मनुष्य सर्वत्र सुख भोगता है। यहाँ तक कि मृत्यु के बाद भी वह कल्याण और सुख को प्राप्त करता है। 31॥   |   mahabharat अध्याय 7.85: धृतराष्ट्रका विलाप   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 85: धृतराष्ट्रका विलाप  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  7.85.31 
धर्मापेक्षी नरो नित्यं सर्वत्र लभते सुखम्।
प्रेत्यभावे च कल्याणं प्रसादं प्रतिपद्यते॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
धर्म की आशा रखने वाला मनुष्य सर्वत्र सुख भोगता है। यहाँ तक कि मृत्यु के बाद भी वह कल्याण और सुख को प्राप्त करता है। 31॥
 
A person who has expectations of religion always enjoys happiness everywhere. Even after death he attains well-being and happiness. 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)