| श्री महाभारत » पर्व 7: द्रोण पर्व » अध्याय 82: युधिष्ठिरका प्रात:काल उठकर स्नान और नित्यकर्म आदिसे निवृत्त हो ब्राह्मणोंको दान देना, वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो सिंहासनपर बैठना और वहाँ पधारे हुए भगवान् श्रीकृष्णका पूजन करना » श्लोक 4-5 |
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| | | | श्लोक 7.82.4-5  | मृदङ्गा झर्झरा भेर्य: पणवानकगोमुखा:।
आडम्बराश्च शङ्खाश्च दुन्दुभ्यश्च महास्वना:॥ ४॥
एवमेतानि सर्वाणि तथान्यान्यपि भारत।
वादयन्ति सुसंहृष्टा: कुशला: साधुशिक्षिता:॥ ५॥ | | | | | | अनुवाद | | भरत! सुशिक्षित और कुशल संगीतज्ञ बड़े हर्ष में भरकर मृदंग, झांझ, भेरी, पणव, आनक, गोमुख, अड़म्ब, शंख और ढोल आदि अनेक प्रकार के वाद्य बजाने लगे। ॥4-5॥ | | | | Bharata! The well-trained and skilled musicians, filled with great joy, began to play the Mridanga, cymbals, bheri, panava, anaka, gomukh, aadamba, shankha and loud drums as well as other kinds of instruments. ॥4-5॥ | | ✨ ai-generated | | |
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