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mahabharat 7.82.26: महाराज! उस समय मोती के आभूषणों से विभूषित महात्मा कुन्तीपुत्र का रूप शत्रुओं का शोक बढ़ा रहा था।   |   mahabharat अध्याय 7.82: युधिष्ठिरका प्रात:काल उठकर स्नान और नित्यकर्म आदिसे निवृत्त हो ब्राह्मणोंको दान देना, वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो सिंहासनपर बैठना और वहाँ पधारे हुए भगवान् श्रीकृष्णका पूजन करना   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 82: युधिष्ठिरका प्रात:काल उठकर स्नान और नित्यकर्म आदिसे निवृत्त हो ब्राह्मणोंको दान देना, वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो सिंहासनपर बैठना और वहाँ पधारे हुए भगवान् श्रीकृष्णका पूजन करना  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  7.82.26 
मुक्ताभरणवेषस्य कौन्तेयस्य महात्मन:।
रूपमासीन्महाराज द्विषतां शोकवर्धनम्॥ २६॥
 
 
अनुवाद
महाराज! उस समय मोती के आभूषणों से विभूषित महात्मा कुन्तीपुत्र का रूप शत्रुओं का शोक बढ़ा रहा था।
 
Maharaj! The form of the great soul Kunti's son, adorned with pearly ornaments, was increasing the grief of the enemies at that time.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)