श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 82: युधिष्ठिरका प्रात:काल उठकर स्नान और नित्यकर्म आदिसे निवृत्त हो ब्राह्मणोंको दान देना, वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो सिंहासनपर बैठना और वहाँ पधारे हुए भगवान् श्रीकृष्णका पूजन करना  »  श्लोक 23-24
 
 
श्लोक  7.82.23-24 
ततस्तस्यां महाबाहोस्तिष्ठत: परिचारका:।
सौवर्णं सर्वतोभद्रं मुक्तावैदूर्यमण्डितम्॥ २३॥
परार्घ्यास्तरणास्तीर्णं सोत्तरच्छदमृद्धिमत्।
विश्वकर्मकृतं दिव्यमुपजह्रुर्वरासनम्॥ २४॥
 
 
अनुवाद
उस मंच पर खड़े हुए महाबाहु युधिष्ठिर के सेवकों ने उन्हें मोती और वैदूर्य रत्नों से जड़ित स्वर्ण निर्मित सर्वतोभद्र नामक एक अद्भुत आसन दिया। उस पर एक बहुमूल्य गद्दा बिछाया गया। उस पर एक सुन्दर चादर बिछाई गई। वह दिव्य एवं समृद्ध सिंहासन स्वयं विश्वकर्मा द्वारा निर्मित था॥23-24॥
 
The servants of the great-armed Yudhishthira, who was standing on that platform, gave him a wonderful seat called Sarvatobhadra made of gold, studded with pearls and vaidurya gems. A precious mattress was spread on it. A beautiful sheet was spread on it. That divine and prosperous throne was made by Vishwakarma himself.॥23-24॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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