श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 82: युधिष्ठिरका प्रात:काल उठकर स्नान और नित्यकर्म आदिसे निवृत्त हो ब्राह्मणोंको दान देना, वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो सिंहासनपर बैठना और वहाँ पधारे हुए भगवान् श्रीकृष्णका पूजन करना  »  श्लोक 17-18h
 
 
श्लोक  7.82.17-18h 
अक्षतै: सुमनोभिश्च वाचयित्वा महाभुज:।
तान् द्विजान् मधुसर्पिर्भ्यां फलै: श्रेष्ठै: सुमङ्गलै:॥ १७॥
प्रादात् काञ्चनमेकैकं निष्कं विप्राय पाण्डव:।
 
 
अनुवाद
तब महाबाहु पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर ने ब्राह्मणों को अक्षत और पुष्प भेंट किए तथा उनसे शुभ मंत्र पढ़वाए। उन्होंने प्रत्येक ब्राह्मण को एक स्वर्ण मुद्रा, शहद, घी और उत्तम शुभ फल भी दिए।
 
Then the mighty-armed Yudhishthira, son of Pandu, offered unbroken rice and flowers to the Brahmins and made them recite the auspicious mantras. He also gave each Brahmin a gold coin along with honey, ghee and the best of auspicious fruits.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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