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mahabharat 7.82.13: सत्पुरुषों के मार्ग पर चलने वाले कुन्तीकुमार युधिष्ठिर ने गायत्री मन्त्र का जप किया और नम्रतापूर्वक जलती हुई अग्नि से प्रकाशित अग्निकोष्ठ में प्रवेश किया॥13॥   |   mahabharat अध्याय 7.82: युधिष्ठिरका प्रात:काल उठकर स्नान और नित्यकर्म आदिसे निवृत्त हो ब्राह्मणोंको दान देना, वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो सिंहासनपर बैठना और वहाँ पधारे हुए भगवान् श्रीकृष्णका पूजन करना   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 82: युधिष्ठिरका प्रात:काल उठकर स्नान और नित्यकर्म आदिसे निवृत्त हो ब्राह्मणोंको दान देना, वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो सिंहासनपर बैठना और वहाँ पधारे हुए भगवान् श्रीकृष्णका पूजन करना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  7.82.13 
जजाप जप्यं कौन्तेय: सतां मार्गमनुष्ठित:।
तत्राग्निशरणं दीप्तं प्रविवेश विनीतवत्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
सत्पुरुषों के मार्ग पर चलने वाले कुन्तीकुमार युधिष्ठिर ने गायत्री मन्त्र का जप किया और नम्रतापूर्वक जलती हुई अग्नि से प्रकाशित अग्निकोष्ठ में प्रवेश किया॥13॥
 
Kuntikumar Yudhishthir, who followed the path of good men, chanted the Gayatri Mantra and humbly entered the fire chamber illuminated by the burning fire. 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)