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श्लोक 7.80.65  |
संजय उवाच
एवं स्तुत्वा महादेवं वासुदेव: सहार्जुन:।
प्रसादयामास भवं तदा ह्यस्त्रोपलब्धये॥ ६५॥ |
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| अनुवाद |
| संजय कहते हैं - इस प्रकार महादेवजी की स्तुति करके उस समय भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के साथ पाशुपतास्त्र प्राप्त करने के लिए भगवान शंकर को प्रसन्न किया ॥65॥ |
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| Sanjay says - By praising Mahadevji in this way, at that time Lord Shri Krishna along with Arjun pleased Lord Shankar for obtaining Pashupatastra. 65॥ |
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इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि प्रतिज्ञापर्वणि अर्जुनस्वप्ने अशीतितमोऽध्याय:॥ ८०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत प्रतिज्ञापर्वमें अर्जुनस्वप्नविषयक अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८०॥
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