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mahabharat 7.80.3: पुण्यात्मा धनंजय की कैसी भी स्थिति क्यों न हो, वह सदैव उठकर प्रेम और भक्तिपूर्वक श्रीकृष्ण का स्वागत करता था। वह अपने इस नियम को कभी नहीं छोड़ता था॥3॥   |   mahabharat अध्याय 7.80: अर्जुनका स्वप्नमें भगवान् श्रीकृष्णके साथ शिवजीके समीप जाना और उनकी स्तुति करना   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 80: अर्जुनका स्वप्नमें भगवान् श्रीकृष्णके साथ शिवजीके समीप जाना और उनकी स्तुति करना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  7.80.3 
प्रत्युत्थानं च कृष्णस्य सर्वावस्थो धनंजय:।
न लोपयति धर्मात्मा भक्त्या प्रेम्णा च सर्वदा॥ ३॥
 
 
अनुवाद
पुण्यात्मा धनंजय की कैसी भी स्थिति क्यों न हो, वह सदैव उठकर प्रेम और भक्तिपूर्वक श्रीकृष्ण का स्वागत करता था। वह अपने इस नियम को कभी नहीं छोड़ता था॥3॥
 
No matter what the condition of the virtuous Dhananjay was, he would always stand up and welcome Shri Krishna with love and devotion. He would never let this rule of his go.॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)