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श्लोक 7.80.3  |
प्रत्युत्थानं च कृष्णस्य सर्वावस्थो धनंजय:।
न लोपयति धर्मात्मा भक्त्या प्रेम्णा च सर्वदा॥ ३॥ |
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| अनुवाद |
| पुण्यात्मा धनंजय की कैसी भी स्थिति क्यों न हो, वह सदैव उठकर प्रेम और भक्तिपूर्वक श्रीकृष्ण का स्वागत करता था। वह अपने इस नियम को कभी नहीं छोड़ता था॥3॥ |
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| No matter what the condition of the virtuous Dhananjay was, he would always stand up and welcome Shri Krishna with love and devotion. He would never let this rule of his go.॥ 3॥ |
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