श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 80: अर्जुनका स्वप्नमें भगवान् श्रीकृष्णके साथ शिवजीके समीप जाना और उनकी स्तुति करना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  7.80.16 
दु:खोपायस्य मे वीर विकाङ्क्षा परिवर्तते।
द्रुतं च याति सविता तत एतद् ब्रवीम्यहम्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
वीर! अब इस कठिन कार्य (जयद्रथ के वध) से मेरी इच्छा नष्ट हो रही है। इसके अतिरिक्त आजकल सूर्य शीघ्र अस्त हो जाता है, इसलिए मैं ऐसा कह रहा हूँ।॥16॥
 
‘Valiant! Now my desire is changing from this difficult task (of killing Jayadratha). Besides this, the sun sets early these days; that is why I am saying this.'॥ 16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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