श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 76: अर्जुनके वीरोचित वचन  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  7.76.21 
तव प्रसादाद् भगवन् किमिवास्ति रणे मम।
अविषह्यं हृषीकेश किं जानन् मां विगर्हसे॥ २१॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! आपकी कृपा से इस युद्धभूमि में ऐसी कौन सी शक्ति है जो मेरे लिए असह्य है? हृषीकेश! यह जानकर भी आप मेरी निन्दा क्यों करते हैं?॥21॥
 
O Lord! By your grace, what is the power in this battlefield that is unbearable for me? Hrishikesh! Why do you criticize me even after knowing this?॥ 21॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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