श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 74: जयद्रथका भय तथा दुर्योधन और द्रोणाचार्यका उसे आश्वासन देना  »  श्लोक 4-5
 
 
श्लोक  7.74.4-5 
अभिमन्यो: पितुर्भीत: सव्रीडो वाक्यमब्रवीत्।
योऽसौ पाण्डो: किल क्षेत्रे जात: शक्रेण कामिना॥ ४॥
स निनीषति दुर्बुद्धिर्मां किलैकं यमक्षयम्।
तत् स्वस्ति वोऽस्तु यास्यामि स्वगृहं जीवितेप्सया॥ ५॥
 
 
अनुवाद
जयद्रथ अभिमन्यु के पिता से बहुत भयभीत था, इसलिए लज्जित होकर बोला, 'राजन्! मैंने सुना है कि पाण्डु की पत्नी के गर्भ से कामातुर इन्द्र के गर्भ से उत्पन्न दुष्टबुद्धि अर्जुन मुझे यमलोक भेजना चाहता है। अतः आप सबका कल्याण हो। अब मैं अपने प्राण बचाने के लिए अपनी राजधानी को लौट जाऊँगा। ॥4-5॥
 
Jayadratha was very afraid of Abhimanyu's father, so he said in shame, 'O kings! I have heard that Arjuna, the evil-minded person born to lustful Indra from the womb of Pandu's wife, wants to send me to Yamaloka. Therefore, may you all be blessed. Now, to save my life, I will go back to my capital. ॥ 4-5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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