श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 74: जयद्रथका भय तथा दुर्योधन और द्रोणाचार्यका उसे आश्वासन देना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  7.74.35 
तत: प्रहर्ष: सैन्यानां तवाप्यासीद् विशाम्पते।
वादित्राणां ध्वनिश्चोग्र: सिंहनादरवै: सह॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
महाराज! तत्पश्चात आपकी सेना भी हर्ष मनाने लगी। सिंहों की गर्जना के साथ-साथ युद्ध-वाध्यों की भयंकर ध्वनि भी गूँजने लगी।
 
Maharaj! Thereafter your army also started rejoicing. Along with the roar of the lions the dreadful sound of the battle instruments also resounded.
 
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि प्रतिज्ञापर्वणि जयद्रथाश्वासे चतु:सप्ततितमोऽध्याय:॥ ७४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत प्रतिज्ञापर्वमें जयद्रथको आश्वासनविषयक चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७४॥

 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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