| श्री महाभारत » पर्व 7: द्रोण पर्व » अध्याय 73: युधिष्ठिरके मुखसे अभिमन्युवधका वृत्तान्त सुनकर अर्जुनकी जयद्रथको मारनेके लिये शपथपूर्ण प्रतिज्ञा » श्लोक 48 |
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| | | | श्लोक 7.73.48  | असुरसुरमनुष्या: पक्षिणो वोरगा वा
पितृरजनिचरा वा ब्रह्मदेवर्षयो वा।
चरमचरमपीदं यत्परं चापि तस्मात्
तदपि ममरिपुं तं रक्षितुं नैव शक्ता:॥ ४८॥ | | | | | | अनुवाद | | देवता, दानव, मनुष्य, पक्षी, नाग, पितर, रात्रिचर प्राणी, ब्रह्मऋषि, देवर्षि, यह जड़-चेतन जगत् तथा इसके परे जो कुछ भी है - ये सब मिलकर भी मेरे शत्रु जयद्रथ की रक्षा नहीं कर सकते। | | | | Gods, demons, human beings, birds, serpents, ancestors, nocturnal creatures, Brahmarishis, Devarshis, this animate and inanimate world and whatever is beyond it - even all of them together cannot protect my enemy Jayadratha. 48. | | ✨ ai-generated | | |
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