श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 71: नारदजीका सृंजयके पुत्रको जीवित करना और व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अन्तर्धान होना  »  श्लोक 4-5
 
 
श्लोक  7.71.4-5 
एतच्छ्रुत्वा महाबाहो धन्यमाख्यानमुत्तमम्।
राजर्षीणां पुराणानां यज्वनां दक्षिणावताम्॥ ४॥
विस्मयेन हृते शोके तमसीवार्कतेजसा।
विपाप्मास्म्यव्यथोपेतो ब्रूहि किं करवाण्यहम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
महाबाहु महर्षि! प्राचीन काल के राजाओं द्वारा यज्ञ और दक्षिणा देने की यह उत्तम एवं प्रशंसनीय कथा सुनकर मैं इतना आश्चर्यचकित हूँ कि इसने मेरे सारे दुःख दूर कर दिए हैं। जैसे सूर्य का तेज समस्त अंधकार को दूर कर देता है। अब मैं पाप (दुःख) और पीड़ा से मुक्त हो गया हूँ। बताइए, आपकी किस आज्ञा का पालन करूँ?॥ 4-5॥
 
Mahabahu Maharshi! I am so amazed to hear this most excellent and praiseworthy story of the ancient kings who used to perform yagna and give dakshina that it has taken away all my sorrow. Just like the brightness of the sun takes away all darkness. Now I am free from sin (sorrow) and pain. Tell me, which of your orders should I follow?'॥ 4-5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)