श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 71: नारदजीका सृंजयके पुत्रको जीवित करना और व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अन्तर्धान होना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  7.71.3 
आहोस्विदन्ततो नष्टं श्राद्धं शूद्रीपताविव।
स एवमुक्त: प्रत्याह प्राञ्जलि: सृञ्जयस्तदा॥ ३॥
 
 
अनुवाद
अथवा कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि जैसे शूद्र जाति की स्त्री से सम्बन्ध रखने वाले ब्राह्मण को दिया गया श्राद्धदान व्यर्थ (निष्फल) हो जाता है, वैसे ही मैंने जो कुछ कहा है, वह सब अन्त में व्यर्थ हो गया।’ उनके ऐसा पूछने पर संजय ने हाथ जोड़कर उत्तर दिया -॥3॥
 
Or has it not happened that just like the Shraddha donation given to a Brahmin who has relations with a woman of the Shudra caste becomes wasted (fruitless), similarly all that I have said has ultimately become futile.' When he asked this, Sanjaya replied with folded hands -॥ 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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