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mahabharat 7.71.17: वीर अभिमन्यु मरकर अपनी पूर्व अवस्था को प्राप्त कर लेता है और चन्द्रमा से उत्पन्न होकर, उसकी अमृतमय किरणों से राजा सोम के समान प्रकाशित होने वाले द्विशरीर में स्थित हो जाता है। अतः तुम्हें उसके लिए शोक नहीं करना चाहिए॥17॥   |   mahabharat अध्याय 7.71: नारदजीका सृंजयके पुत्रको जीवित करना और व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अन्तर्धान होना   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 71: नारदजीका सृंजयके पुत्रको जीवित करना और व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अन्तर्धान होना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  7.71.17 
अन्तात् पुनर्भावगतो विराजते
राजेव वीरो ह्यमृतात्मरश्मिभि:।
तामैन्दवीमात्मतनुं द्विजोचितां
गतोऽभिमन्युर्न स शोकमर्हति॥ १७॥
 
 
अनुवाद
वीर अभिमन्यु मरकर अपनी पूर्व अवस्था को प्राप्त कर लेता है और चन्द्रमा से उत्पन्न होकर, उसकी अमृतमय किरणों से राजा सोम के समान प्रकाशित होने वाले द्विशरीर में स्थित हो जाता है। अतः तुम्हें उसके लिए शोक नहीं करना चाहिए॥17॥
 
The brave Abhimanyu, after his death, regains his previous state and is established in his double body born from the moon, shining like King Soma with its nectar-like rays. Therefore you should not mourn for him. 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)