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श्लोक 7.66.21  |
स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया।
पुत्रात् पुण्यतरस्तुभ्यं मा पुत्रमनुतप्यथा:।
अयज्वानमदाक्षिण्यमभि श्वैत्येत्युदाहरत्॥ २१॥ |
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| अनुवाद |
| श्वेत सृंजय ! वह धर्म-ज्ञान आदि चार कल्याणकारी गुणों में तुमसे बहुत श्रेष्ठ था और तुम्हारे पुत्र से भी अधिक पुण्यशाली था। जब वे भी मर गए, तो औरों के विषय में तो कहना ही क्या? अतः तुम यज्ञ और दान से रहित अपने पुत्र के लिए पश्चाताप न करो। नारदजी ने ऐसा कहा ॥21॥ |
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| White Srinjay! He was much superior to you in the four beneficial qualities of religious knowledge etc. and was even more virtuous than your son. When they too died, what can we say about others? Therefore, do not repent for your son who is devoid of yagya rituals and donations. Naradji said this. 21॥ |
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इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि षोडशराजकीये षट्षष्टितमोऽध्याय:॥ ६६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें षोडशराजकीयोपाख्यानविषयक छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६६॥
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