| श्री महाभारत » पर्व 7: द्रोण पर्व » अध्याय 66: राजा गयका चरित्र » श्लोक 2-5 |
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| | | | श्लोक 7.66.2-5  | तस्मै ह्यग्निर्वरं प्रादात् ततो वव्रे वरं गय:।
तपसा ब्रह्मचर्येण व्रतेन नियमेन च॥ २॥
गुरूणां च प्रसादेन वेदानिच्छामि वेदितुम्।
स्वधर्मेणाविहिंस्यान्यान् धनमिच्छामि चाक्षयम्॥ ३॥
विप्रेषु ददतश्चैव श्रद्धा भवतु नित्यश:।
अनन्यासु सवर्णासु पुत्रजन्म च मे भवेत्॥ ४॥
अन्नं मे ददत: श्रद्धा धर्मे मे रमतां मन:।
अविघ्नं चास्तु मे नित्यं धर्मकार्येषु पावक॥ ५॥ | | | | | | अनुवाद | | इससे प्रसन्न होकर अग्निदेव ने उनसे वर देने की इच्छा प्रकट की। (अग्निदेव की आज्ञा से) गय ने उनसे यह वर माँगा- ‘मैं तप, ब्रह्मचर्य, व्रत, नियम और गुरुजनों की कृपा से वेदों का ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूँ। मैं दूसरों को कष्ट पहुँचाए बिना अपने धर्म का पालन करते हुए अक्षय धन अर्जित करना चाहता हूँ। मैं ब्राह्मणों को दान देता रहूँ और इस कार्य में मेरी भक्ति प्रतिदिन बढ़ती जाए। मैं अपनी ही जाति की पतिव्रता कन्याओं से विवाह करूँ और उनके गर्भ से मेरे पुत्र उत्पन्न हों। अन्नदान में मेरी भक्ति बढ़े और मेरा मन धर्म में लगा रहे। अग्निदेव! मेरे धार्मिक कार्यों में कभी कोई बाधा न आए।’॥ 2-5॥ | | | | Pleased with this, Agnidev expressed his wish to grant him a boon. (By the order of Agnidev) Gaya asked for this boon from him- ‘I want to acquire the knowledge of Vedas through penance, celibacy, fasting, rules and the grace of the Gurus. I want to earn inexhaustible wealth by following my religion without hurting others. I should keep giving donations to Brahmins and my devotion for this work should increase more and more every day. I should get married to the faithful girls of my own caste and my sons should be born from their wombs. My devotion for donating food should increase and my mind should remain focused on religion. Agnidev! May there never be any obstacle in my religious works.’॥ 2-5॥ | | ✨ ai-generated | | |
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