श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 65: राजा शशबिन्दुका चरित्र  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  7.65.12 
स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया।
पुत्रात् पुण्यतरस्तुभ्यं मा पुत्रमनुतप्यथा:।
अयज्वानमदाक्षिण्यमभि श्वैत्येत्युदाहरत्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
श्वेता संजय! ये चारों ही शुभ गुणों में तुमसे श्रेष्ठ थे और तुम्हारे पुत्रों से भी अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी मर गए, तो अन्यों का क्या कहना? अतः तुम्हें अपने उस पुत्र के लिए शोक नहीं करना चाहिए जो यज्ञ और दान से वंचित है। ऐसा नारदजी ने कहा।
 
Shvaitya Sanjaya! All four of them were superior to you in auspicious qualities and were much more pious than your sons. When they too have died, what to say about others? Therefore, you should not grieve for your son who is deprived of sacrifices and donations. This is what Naradji said.
 
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि षोडशराजकीये पञ्चषष्टितमोऽध्याय:॥ ६५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें षोडशराजकीयोपाख्यानविषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६५॥

 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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