श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 55: षोडशराजकीयोपाख्यानका आरम्भ, नारदजीकी कृपासे राजा सृंजयको पुत्रकी प्राप्ति, दस्युओंद्वारा उसका वध तथा पुत्रशोकसंतप्त सृंजयको नारदजीका मरुत्तका चरित्र सुनाना  »  श्लोक 30-31
 
 
श्लोक  7.55.30-31 
गृह्यैनमनुपायज्ञा नीत्वारण्यमचेतस:॥ ३०॥
हत्वा विशस्य चापश्यन् लुब्धा वसु न किञ्चन।
तस्य प्राणैर्विमुक्तस्य नष्टं तद् वरदं वसु॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
उन अज्ञानी लुटेरों ने उचित मार्ग न जानते हुए उसे वन में ले जाकर मार डाला। उन्होंने उसके शरीर के टुकड़े-टुकड़े करके उसे देखा, परन्तु उन्हें उसमें से रत्ती भर भी धन न मिला। उसके मरते ही उसका वरदान देने वाला तेज लुप्त हो गया ॥30-31॥
 
Not knowing the right way, those ignorant robbers took him to the forest and killed him. They cut his body into pieces and looked at it, but they could not find even a little bit of wealth. As soon as he died, his boon-giving glory vanished. ॥30-31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)