श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 55: षोडशराजकीयोपाख्यानका आरम्भ, नारदजीकी कृपासे राजा सृंजयको पुत्रकी प्राप्ति, दस्युओंद्वारा उसका वध तथा पुत्रशोकसंतप्त सृंजयको नारदजीका मरुत्तका चरित्र सुनाना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  7.55.2 
युधिष्ठिर उवाच
गुरव: पुण्यकर्माण: शक्रप्रतिमविक्रमा:।
स्थाने राजर्षयो ब्रह्मन्ननघा: सत्यवादिन:॥ २॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले - ब्रह्मन्! इन्द्र के समान पराक्रमी, श्रेष्ठ, पुण्यात्मा, पापरहित और सत्यवादी राजर्षि अपने योग्य उत्तम लोक (लोक) में निवास करते हैं॥2॥
 
Yudhishthir said – Brahmin! Like Indra, the mighty, noble, virtuous, sinless and truthful Rajarishis reside in the best place (world) worthy of them. 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)