श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 54: मृत्युकी घोर तपस्या, ब्रह्माजीके द्वारा उसे वरकी प्राप्ति तथा नारद-अकम्पन-संवादका उपसंहार  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  7.54.49 
त्यक्त्वा दु:खं संगत: पुण्यकृद्भि-
रेषा मृत्युर्देवदिष्टा प्रजानाम्।
प्राप्ते काले संहरन्ती यथावत्
स्वयं कृता प्राणहरा प्रजानाम्॥ ४९॥
 
 
अनुवाद
वह दुःख को त्यागकर पुण्यात्मा लोगों से मिल गया है । जीवों के लिए यह मृत्यु भगवान ही देते हैं; जो समय आने पर उचित रीति से (लोगों को) मारते हैं । ब्रह्माजी ने ही लोगों के प्राणों को हरने वाली इस मृत्यु को उत्पन्न किया है ॥49॥
 
He has given up sorrow and joined the virtuous people. This death for living beings is given by God only; Who kills (people) appropriately when the time comes. Brahmaji himself has created this death that takes the lives of the people. 49॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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