श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 54: मृत्युकी घोर तपस्या, ब्रह्माजीके द्वारा उसे वरकी प्राप्ति तथा नारद-अकम्पन-संवादका उपसंहार  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  7.54.43 
तेनात्मानं पावयस्वात्मना त्वं
पापेऽऽत्मानं मज्जयिष्यन्त्यसत्यात्।
तस्मात् कामं रोषमप्यागतं त्वं
संत्यज्यान्त: संहरस्वेति जीवान्॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
धर्म के मार्ग पर चलकर अपने को पवित्र करो। मिथ्यात्व का आश्रय लेकर प्राणी स्वयं ही पाप के कीचड़ में डूब जाएँगे। अतः अपने मन में उत्पन्न हुए काम और क्रोध को त्यागकर तुम समस्त प्राणियों का संहार करो। ॥ 43॥
 
Purify yourself by following the path of righteousness. By resorting to falsehood, beings will themselves drown themselves in the filth of sin. Therefore, by abandoning the lust and anger that have arisen in your mind, you should kill all living beings. ॥ 43॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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