श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 53: शंकर और ब्रह्माका संवाद, मृत्युकी उत्पत्ति तथा उसे समस्त प्रजाके संहारका कार्य सौंपा जाना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  7.53.14 
मा विनश्येज्जगन्नाथ जगत‍् स्थावरजङ्गमम्।
प्रसादाभिमुखं देवं तस्मादेवं ब्रवीम्यहम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
जगन्नाथ! यह चर-अचर जगत नष्ट न हो, इसलिए मैं उन प्रभु से यह प्रार्थना कर रहा हूँ जो कृपा करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं॥14॥
 
Jagannath! This animate and inanimate world should not be destroyed, that is why I am making this prayer to the Lord who is always ready to shower His blessings. ॥ 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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