श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 50: तीसरे (तेरहवें) दिनके युद्धकी समाप्तिपर सेनाका शिविरको प्रस्थान एवं रणभूमिका वर्णन  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  7.50.8 
प्रविद्धवर्माभरणाम्बरायुधा
विपन्नहस्त्यश्वरथानुगा नरा:।
महार्हशय्यास्तरणोचितास्तदा
क्षितावनाथा इव शेरते हता:॥ ८॥
 
 
अनुवाद
योद्धाओं के कवच, आभूषण, वस्त्र और हथियार चूर-चूर हो गए। रथों के पीछे चलने वाले हाथी, घोड़े और पैदल सैनिक प्राण गँवाकर गिर पड़े। जो राजा और राजकुमार महँगे पलंगों और चटाइयों पर सोने के योग्य थे, वे भी मारे गए और अनाथों की तरह ज़मीन पर पड़े रहे।
 
The armor, ornaments, clothes and weapons of the warriors were shattered to pieces. The elephants, horses and footmen following the chariots lost their lives and fell down. The kings and princes who were fit to sleep on costly beds and mats were themselves killed and lying on the ground like orphans.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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