| श्री महाभारत » पर्व 7: द्रोण पर्व » अध्याय 50: तीसरे (तेरहवें) दिनके युद्धकी समाप्तिपर सेनाका शिविरको प्रस्थान एवं रणभूमिका वर्णन » श्लोक 5 |
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| | | | श्लोक 7.50.5  | महाभ्रकूटाचलशृङ्गसंनिभै-
र्गजैरनेकैरिव वज्रपातितै:।
स वैजयन्त्यङ्कुशवर्मयन्तृभि-
र्निपातितैर्नष्टगतिश्चिता क्षिति:॥ ५॥ | | | | | | अनुवाद | | महान मेघों और पर्वत शिखरों के समान विशाल हाथी वज्र से मारे हुए से प्रतीत हो रहे थे। समस्त पृथ्वी गिरे हुए हाथियों के शरीरों, उनकी वैजयंती ध्वजा, अंकुश, कवच और महावतों से ढकी हुई थी, जिससे आवागमन का मार्ग अवरुद्ध हो गया था॥5॥ | | | | A large number of elephants, as huge as the great clouds and mountain peaks, were lying as if they had been struck down by thunderbolts. The entire ground was covered with the bodies of the fallen elephants, along with their Vaijayanti flag, goads, armour and mahouts, due to which the path of movement was blocked.॥ 5॥ | | ✨ ai-generated | | |
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