श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 50: तीसरे (तेरहवें) दिनके युद्धकी समाप्तिपर सेनाका शिविरको प्रस्थान एवं रणभूमिका वर्णन  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  7.50.4 
वरासिशक्त्यृष्टिवरूथचर्मणां
विभूषणानां च समाक्षिपन् प्रभा:।
दिवं च भूमिं च समानयन्निव
प्रियां तनुं भानुरुपैति पावकम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
सूर्यदेव उत्तम तलवार, भाला, बाण, ढाल और आभूषणों की तेजस्विता को छीनकर तथा आकाश और पृथ्वी को सम अवस्था में लाकर अपने प्रिय शरीर-अग्नि में प्रवेश कर रहे थे॥4॥
 
The Sun God, snatching away the radiance of the best sword, spear, arrow, shield and ornaments and bringing the sky and the earth in equal state, was entering his beloved body-the fire. ॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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