श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 50: तीसरे (तेरहवें) दिनके युद्धकी समाप्तिपर सेनाका शिविरको प्रस्थान एवं रणभूमिका वर्णन  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  7.50.2 
निरीक्षमाणास्तु वयं परे चायोधनं शनै:।
अपयाता महाराज ग्लानिं प्राप्ता विचेतस:॥ २॥
 
 
अनुवाद
महाराज! युद्धभूमि को देखते हुए हम और शत्रु पक्ष के लोग धीरे-धीरे वहाँ से चले गए। पाण्डव पक्ष के लोग अत्यन्त शोक के कारण अचेत हो रहे थे॥ 2॥
 
Maharaj! Looking at the battlefield, we and the people of the enemy side slowly moved away from there. The people of the Pandava side were becoming unconscious due to extreme grief.॥ 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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