श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 50: तीसरे (तेरहवें) दिनके युद्धकी समाप्तिपर सेनाका शिविरको प्रस्थान एवं रणभूमिका वर्णन  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  7.50.15 
अपेतविध्वस्तमहार्हभूषणं
निपातितं शक्रसमं महाबलम्।
रणेऽभिमन्युं ददृशुस्तदा जना
व्यपोढहव्यं सदसीव पावकम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
उस समय लोगों ने देखा कि इन्द्र के समान महाबली अभिमन्यु युद्धभूमि में गिरा दिया गया है। उसके बहुमूल्य आभूषण छिन्न-भिन्न होकर उसके शरीर से गिर पड़े हैं और वह यज्ञवेदी पर आहुति के बिना अग्नि के समान निर्जीव हो गया है।
 
At that time people saw that Abhimanyu, a mighty warrior like Indra, had been thrown down on the battlefield. His precious ornaments had been torn to pieces and had fallen away from his body and he had become lifeless like a fire without offerings on the sacrificial altar.
 
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि तृतीयदिवसावहारे समरभूमिवर्णने पञ्चाशत्तमोऽध्याय:॥ ५०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें तीसरे दिनके युद्धमें सेनाके शिविरमें प्रस्थान करते समय समरभूमिका वर्णनविषयक पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५०॥

 
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