| श्री महाभारत » पर्व 7: द्रोण पर्व » अध्याय 50: तीसरे (तेरहवें) दिनके युद्धकी समाप्तिपर सेनाका शिविरको प्रस्थान एवं रणभूमिका वर्णन » श्लोक 10 |
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| | | | श्लोक 7.50.10  | त्वचो विनिर्भिद्य पिबन् वसामसृक्
तथैव मज्जा: पिशितानि चाश्नुवन्।
वपां विलुम्पन्ति हसन्ति गान्ति च
प्रकर्षमाणा: कुणपान्यनेकश:॥ १०॥ | | | | | | अनुवाद | | वे मरे हुओं की खाल फाड़ते, उनकी चर्बी और रक्त पीते, मज्जा और मांस खाते, चर्बी काटते और चबाते तथा बहुत से मरे हुओं को इधर-उधर घसीटते हुए हँसते और गीत गाते थे॥10॥ | | | | They were tearing the skin of the dead and drinking their fat and blood, eating the marrow and flesh, cutting and chewing the fat and dragging many of the dead here and there while they laughed and sang songs.॥10॥ | | ✨ ai-generated | | |
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