श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 5: कर्णका दुर्योधनके समक्ष सेनापति-पदके लिये द्रोणाचार्यका नाम प्रस्तावित करना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  7.5.9 
यथा ह्यकर्णधारा नौ रथश्चासारथिर्यथा।
द्रवेद् यथेष्टं तद्वत् स्यादृते सेनापतिं बलम्॥ ९॥
 
 
अनुवाद
जैसे नाविक के बिना नाव पानी में बह जाती है और सारथि के बिना रथ जहाँ चाहे वहाँ भटक जाता है, वैसे ही सेनापति के बिना सेना जहाँ चाहे वहाँ भाग जाती है॥9॥
 
Just as a boat without a sailor drifts away in the water and a chariot without a charioteer wanders wherever it wishes, so too an army without a commander can flee wherever it wishes.॥ 9॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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