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श्लोक 7.5.2  |
सनाथमिव मन्येऽहं भवता पालितं बलम्।
अत्र किं नु समर्थं यद्धितं तत् सम्प्रधार्यताम्॥ २॥ |
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| अनुवाद |
| कर्ण! यह सेना तुम्हारे द्वारा रक्षित है, अतः मैं इसे रक्षित ही मानता हूँ। अब तुम निश्चय करो कि यहाँ हमारे लिए क्या करना हितकर और लाभदायक है।॥2॥ |
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| Karna! This army is being protected by you, so I consider it as if it is protected. Now decide what is useful and beneficial for us to do here.'॥ 2॥ |
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