श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 42: अभिमन्युके पीछे जानेवाले पाण्डवोंको जयद्रथका वरके प्रभावसे रोक देना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  7.42.12 
संजय उवाच
द्रौपदीहरणे यत् तद् भीमसेनेन निर्जित:।
मानात् स तप्तवान् राजा वरार्थी सुमहत् तप:॥ १२॥
 
 
अनुवाद
संजय ने कहा - महाराज! द्रौपदी के अपहरण के समय जयद्रथ को भीमसेन के हाथों पराजित होना पड़ा था। अपने अभिमान के कारण राजा ने अपमानित महसूस किया और वरदान पाने की इच्छा से घोर तपस्या की।
 
Sanjaya said - Maharaj! In the event of the abduction of Draupadi, Jayadratha had to be defeated by Bhimasena. Due to his pride, the king felt insulted and performed severe penance with the desire of obtaining a boon.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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