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श्लोक 7.42.10  |
अत्यद्भुतमहं मन्ये बलं शौर्यं च सैन्धवे।
तस्य प्रब्रूहि मे वीर्यं कर्म चाग्रॺं महात्मन:॥ १०॥ |
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| अनुवाद |
| मैं इस बात को बहुत आश्चर्य मानता हूँ कि सिंधु के राजा में इतना बल और पराक्रम है। महाबली जयद्रथ के बल और पराक्रम का मुझे विस्तारपूर्वक वर्णन करो। |
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| I consider it very surprising that the king of Sindhu possesses such strength and valour. Describe to me in detail the strength and valour of the great man Jayadratha. |
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