| श्री महाभारत » पर्व 7: द्रोण पर्व » अध्याय 4: भीष्मजीका कर्णको प्रोत्साहन देकर युद्धके लिये भेजना तथा कर्णके आगमनसे कौरवोंका हर्षोल्लास » श्लोक 2-3 |
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| | | | श्लोक 7.4.2-3  | समुद्र इव सिन्धूनां ज्योतिषामिव भास्कर:।
सत्यस्य च यथा सन्तो बीजानामिव चोर्वरा॥ २॥
पर्जन्य इव भूतानां प्रतिष्ठा सुहृदां भव।
बान्धवास्त्वानुजीवन्तु सहस्राक्षमिवामरा:॥ ३॥ | | | | | | अनुवाद | | हे कर्ण! जिस प्रकार सरिताओं का आश्रय समुद्र, प्रकाशमान वस्तुओं का सूर्य, सत्य का ऋषि, बीजों का उपजाऊ भूमि और प्राणियों की जीविका का आधार बादल हैं, उसी प्रकार आप भी अपने मित्रों के आश्रय बनें। जैसे देवता सहस्रलोचन इन्द्र का आश्रय लेकर अपना जीवन निर्वाह करते हैं, उसी प्रकार समस्त बंधु-बांधव और मित्रगण आपका आश्रय लेकर जीवनयापन करें। 2-3॥ | | | | Ear! Just as the ocean is the shelter of streams, the sun of luminous things, the sage of truth, the fertile land of seeds and the clouds the basis of livelihood of living beings, in the same way you too should be the shelter of your friends. Just as the gods live their life by taking shelter of Sahasralochana Indra, in the same way, may all the relatives and friends live by taking shelter of you. 2-3॥ | | ✨ ai-generated | | |
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