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श्लोक 7.39.31  |
अथ पणवमृदङ्गदुन्दुभीनां
क्रकचमहानकभेरिझर्झराणाम्।
निनदमतिभृशं नरा: प्रचक्रु-
र्लवणजलोद्भवसिंहनादमिश्रम्॥ ३१॥ |
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| अनुवाद |
| उस समय वादकों ने ढोल, मृदंग, दुन्दुभि, क्रकच, ढोल, भेरी और झांझ की अत्यन्त भयंकर ध्वनियाँ निकालनी आरम्भ कीं। उसमें शंख और सिंह की दहाड़ भी सम्मिलित थी। |
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| At that time the musicians started making very terrifying sounds of dhol, mridanga, dundubhi, krakach, big drum, bheri and cymbals. The sound of conch and roar of lion was also mixed in it. |
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इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि दु:शासनयुद्धे एकोनचत्वारिंशोऽध्याय:॥ ३९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें दु:शासनयुद्धविषयक उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३९॥
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