श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 39: द्रोणाचार्यके द्वारा अभिमन्युके पराक्रमकी प्रशंसा तथा दुर्योधनके आदेशसे दु:शासनका अभिमन्युके साथ युद्ध आरम्भ करना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  7.39.13 
नास्य युद्धे समं मन्ये कंचिदन्यं धनुर्धरम्।
इच्छन् हन्यादिमां सेनां किमर्थमपि नेच्छति॥ १३॥
 
 
अनुवाद
मैं रणभूमि में किसी अन्य धनुर्धर को उसके समान नहीं मानता। यदि वह चाहे तो इस सम्पूर्ण सेना का संहार कर सकता है; किन्तु मैं नहीं जानता कि वह ऐसा क्यों नहीं करना चाहता।॥13॥
 
‘I do not consider any other archer to be equal to him in the battlefield. If he wishes, he can destroy this entire army; but I do not know why he does not wish to do so.'॥ 13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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