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श्लोक 7.39.13  |
नास्य युद्धे समं मन्ये कंचिदन्यं धनुर्धरम्।
इच्छन् हन्यादिमां सेनां किमर्थमपि नेच्छति॥ १३॥ |
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| अनुवाद |
| मैं रणभूमि में किसी अन्य धनुर्धर को उसके समान नहीं मानता। यदि वह चाहे तो इस सम्पूर्ण सेना का संहार कर सकता है; किन्तु मैं नहीं जानता कि वह ऐसा क्यों नहीं करना चाहता।॥13॥ |
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| ‘I do not consider any other archer to be equal to him in the battlefield. If he wishes, he can destroy this entire army; but I do not know why he does not wish to do so.'॥ 13॥ |
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