श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 35: युधिष्ठिर और अभिमन्युका संवाद तथा व्यूहभेदनके लिये अभिमन्युकी प्रतिज्ञा  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  7.35.8 
महौघ: सलिलस्येव गिरिमासाद्य दुर्भिदम्।
द्रोणं ते नाभ्यवर्तन्त वेलामिव जलाशया:॥ ८॥
 
 
अनुवाद
जैसे जल का विशाल प्रवाह अभेद्य पर्वत पर पहुँचकर रुक जाता है और जैसे जल से भरा हुआ सागर भी अपने तट को पार नहीं कर पाता, वैसे ही पाण्डव सैनिक द्रोणाचार्य के बहुत निकट नहीं पहुँच पाए॥8॥
 
Just as a great flow of water is obstructed when it reaches an impenetrable mountain and just as a full body of water (ocean) cannot cross its shore, similarly the Pandava soldiers were not able to get very close to Dronacharya.॥ 8॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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